रोयोन की सहयोगी प्रियंका त्रिपाठी द्वारा लिखी गयी एक कविता

रोयोन की सहयोगी प्रियंका त्रिपाठी द्वारा लिखी गयी एक कविता

सिर पर अरमानों का बोझ और
आंखों में खोने का दर्द लिए,
बेबसी की चादर ओढ़
बढ़ चला घर की ओर,
अपनों के बीच सुकून की उम्मीद लिए।
मीलों लंबा सफर
कदम कदम नापता हुआ,
मंजिल की उम्मीद में
पल पल खुद को संभालता हुआ।
आह! मजबूर हैं अपने कलेजे के टुकड़ों को
तपती धूप में बिलखते देखने को
सूखी रोटी में मजबूरी का अचार और
बेबसी के आंसू लपेटती पत्नी को ।
हाय! भाग्य लिखते हुए
लेखनी न थर्रायी विधाता की,
क्या ऐसे दुर्दिन लिखे थे
किस्मत में भारत भाग्य विधाता की।
जिन हाथों ने रूप दिया
लंबी चौड़ी सड़को को,
उसी पर घिसटती लिए जा रही
मृगतृष्णा उन भूखे नंगों को।
अंतर्वेदना संग छाले
पस,आंसू बन के फूट रहा,
हर लम्हा उसके अंदर कुछ
किरच-किरच के टूट रहा।
हाय! कलेजा ना फटा तुम्हारा
तनिक दया ना आई,
भूख प्यास से व्यथित प्राण ने
जब गुहार लगाई।
इस अंतहीन पथ पर ना जाने
कितने काल के गाल समाए,
बिखरी रोटी,टूटी चप्पल
खून मे सने नहाए ।
आसमान की ओर देख रहा
सजल करुण नयनों से,
क्या मेहनतकश होने का
यह फल प्राप्त हो रहा तुमसे!!

प्रियंका त्रिपाठी

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